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शांडोर फेरेन्जी

हंगेरियन मनोविश्लेषक (1873–1933), दो दशकों तक फ़्रॉयड के सबसे निकट सहयोगी और अन्ततः भीतर से विश्लेषण के सबसे पैने आलोचक। बुदापेस्त में चिकित्सक, युवावस्था से ही सम्मोहन और निर्धनों की तंत्रिका-चिकित्सा में रुचि रखने वाले, वे 1908 में फ़्रॉयड से मिले, 1909 में उनके और युंग के साथ क्लार्क विश्वविद्यालय गए, 1913 में हंगेरियन मनोविश्लेषण समिति की स्थापना की और 1918 में अन्तरराष्ट्रीय मनोविश्लेषण संघ के अध्यक्ष चुने गए।

उनका सैद्धान्तिक कार्य अन्तःक्षेपण से — यह शब्द उन्हीं का गढ़ा है — «थलासा: जननांगता के सिद्धान्त पर निबन्ध» (1924) की कल्पनाशील जीवविज्ञान तक फैला है, जिसने रति-क्रिया को समुद्र की ओर लौटने के रूप में पढ़ा। किन्तु उन्हें अलग करती है उनकी नैदानिक बेचैनी: जो रोगी धीरे सुधरते या बिलकुल नहीं सुधरते, उनसे असन्तुष्ट होकर उन्होंने क्रमशः वह «सक्रिय तकनीक» आज़माई जो कार्य और निषेध थोपती थी, फिर उसका उलटा, अर्थात् शिथिलन और उदारता का सिद्धान्त, और अन्ततः वह पारस्परिक विश्लेषण जो 1932 की «नैदानिक दैनन्दिनी» में दर्ज है, जिसमें विश्लेषक और रोगी बारी-बारी से दीवान पर लेटते थे।

उसी वर्ष वीसबाडेन सम्मेलन में पढ़ा गया उनका आलेख «बड़ों और बच्चे के बीच भाषाओं का घालमेल» उस ओर लौटता है जिसे फ़्रॉयड ने किनारे रख दिया था: कि बचपन में यौन हिंसा के जो वृत्तान्त रोगी सुनाते हैं वे प्रायः सच होते हैं; कि बच्चे की स्नेह-भाषा और वयस्क की आवेग-भाषा एक नहीं; और कि विश्लेषक की अपनी ठंडक या पाखंड महसूस होती है और मूल चोट को दुहराती है। इस आलेख ने उनसे फ़्रॉयड का विश्वास छीन लिया और आधी शताब्दी तक उनकी प्रतिष्ठा; «दैनन्दिनी» 1985 में ही छपी। मेलानी क्लाइन, माइकल बालिंट और क्लारा थॉम्पसन ने उन्हीं से विश्लेषण या प्रशिक्षण पाया, और सम्बन्धपरक मनोविश्लेषण आज उन्हें अपने संस्थापकों में गिनता है।

1 कृति