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Psychologie vom empirischen Standpunkte

फ़्रांत्स ब्रेंटानो

भाषा:
जर्मन
स्थिति:
संपूर्ण कृति
लेखकत्व:
लेखक द्वारा लिखित
पाठ की स्थिति:
स्कैन की कोई गड़बड़ी नहीं मिली (पूरे पाठ पर स्वचालित माप, हाथ से जाँचा नहीं गया)
विस्तार:
~1,50,000 शब्द · 733 अंश
इस कृति का हवाला दें
  • APAफ़्रांत्स ब्रेंटानो. (n.d.). Psychologie vom empirischen Standpunkte. Digital reproduction: SigPhi. https://sigphiai.com/hi/works/franz-brentano/psychologie-vom-empirischen-standpunkte
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यह उस संस्करण का संदर्भ है जिसे SigPhi पुनः प्रस्तुत करता है: SigPhi उसकी डिजिटल प्रति है, प्रकाशक नहीं। संस्करण का वर्ष मेटाडेटा में नहीं है (इसलिए «n.d.»), और अनुवादक तभी दिखाया जाता है जब वह दर्ज हो।

यह किस बारे में है

1874 की वह पुस्तक जिसने यह प्रश्न फिर से खोला कि मानसिक को भौतिक से क्या अलग करता है, और जिसने बाद के दर्शन को 'सप्रयोजनता' (इंटेंशनैलिटी) की धारणा दी।

संदर्भ और इतिहास

केंद्रीय प्रतिज्ञा छोटी है और अत्यंत फलवती सिद्ध हुई: हर मानसिक परिघटना 'किसी वस्तु की' होती है। ऐसा कोई देखना नहीं जो कुछ न देखे, न ऐसी कोई इच्छा जिसका कोई इष्ट न हो; वस्तु उसमें उस ढंग से समाई रहती है जिसे ब्रेंतानो 'सप्रयोजन' कहते थे, और जिसके लिए उस वस्तु का वास्तव में होना ज़रूरी नहीं — जो नहीं है उससे भी डरा जा सकता है। किसी भौतिक परिघटना में यह नहीं, इसलिए यही लक्षण दोनों क्षेत्रों को अलग करने में काम आता है। ब्रेंतानो ऐसा मनोविज्ञान चाहते थे जो अनुभवाश्रित तो हो पर प्रयोगशाला के अर्थ में प्रयोगात्मक न हो — जो दिया गया है उसके सावधान वर्णन से बना हो। हुसर्ल उनके शिष्य थे और वहीं से घटनाशास्त्र निकला; माइनोंग, त्वार्दोव्स्की, और कुछ समय फ़्रॉयड भी यहीं से गुज़रे।

यह संपादकीय संदर्भ है, उद्धरण-योग्य स्रोत नहीं: कृति के अंशों के विपरीत, इन कथनों की जाँच कॉर्पस में नहीं की जा सकती।

शुरुआत
Die Beschränkung war keine willkürliche. Im Gegentheil, sie erscheint als eine offenbare Berichtigung, geboten durch die Natur der Sache selbst. Denn nur dann sind ja die Grenzlinien der Wissenschaften richtig gezogen ^ und nur dann ist ihre Eintheilung dem Fortschritte der Erkenntniss dienlich, wenn das Verwandtere verbunden, das minder Verwandte getrennt wurde. Und verwandt in vorzüglichem Maasse «ind die Erscheinungen des Bewusstseins. Dieselbe Weise der Wahrnehmung gibt uns von ihnen allen Kenntniss, und höhere und niedere sind duixh zahlreiche Analogien einander nahe gerückt. Was aber die äussere Wahrnehmung uns von den lebenden Wesen zeigt, das sehen wir, wie von einer andern Seite, so auch in einer ganz anderen Gestalt, und die allgemeinen Thatsachen, welche wir hier finden, sind theils dieselben, theils ähnliche Gesetze wie die, welche wir die unorganische Natur beherrschen sehen. Man könnte auch nicht ohne Grund sagen, dass Aristoteles selbst bereits eine Andeutung der neueren und berichtigten Umgrenzung der Psychologie gegeben habe. Und wer ihn kennt, der weiss, wie häufig sich bei ihm mit der- Darlegung einer minder vorgeschrittenen Lehre solche Ansätze zu. einer abweichenden und richtigeren Anschauung verbinden. Sowohl seine Metaphysik als auch seine Logik und Ethik liefern dafür Belege. Im dritten Buche von der Seele also, da wo er von der willkürlichen Bewegung handelt, entschlägt er sich der Forschung nach den vermittelnden Organen zwischen dem Begehren und dem Gliede auf dessen Bewegung das Begehren gerichtet ist. Denn diese aufzusuchen, sagt er, indem er ganz wie ein moderner Psychologe spricht, sei nicht Sache dessen, der über die Seele, sondern dessen, der über den Leib forsche^).…

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